उम्मीद…Umeed Poem by Senior Citizen

Vijay Pathik Gulati is a Senior Citizens who got inspired to pick up the pen again to express his thoughts as a poem and we at Aam Press are very happy to provide him a platform !

0
85

दवाएं लेता लेता थक गया हूँ

अब दुआओं की दरकार है ।

निभाई जिम्मेदारियां अब

जिन्दगी आराम की तलबगार है ।

कोशिश है अभी कुछ कर गुजरूं

बस इक मौके का इंतजार है ।

बैठ बैठ कर उठने की कोशिश है

गिर न जाऊं ये डर सताता है

आंधियां हैं तूफान भी साथ है

इन्हे रोकता हूँ थामता हूँ

बस अब यही सिलसिले वार है ।

जीत जाऊं ये आखिरी जगं भी

बस यही उम्मीद बरकरार है ।।

~ विजय पथिक गुलाटी

LEAVE A REPLY