कैसे मददगार है पोक्सो एक्ट

18 साल से कम उम्र के बच्चों से किसी भी तरह का सेक्सुअल बर्ताव इस प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेंस (पोक्सो) कानून के दायरे में आता है। इसके तहत लडक़े और लडक़ी,दोनों को ही प्रोटेक्ट किया गया है। इसके तहत दोषियों के लिए कठोर सजा का प्रावधान है।

0
175

पिछले कुछ समय में अचानक बाल शोषण के मामलों का बढ़ जाना सामजिक द्रष्टि से काफी डरावना है जब अभिवावक अपने बच्चो  को स्कूल ,बाजार या खेल के मैदान में भेजते है तब एक अनजाना डर उनको सताता है की क्या उनका बच्चा सुरक्षित है ? काफी हद तक स्कूल और घरो में  योन शोषण के बारे में शिक्षा दी जाने लगी है पर फिर भी समाज का जागरूक होना अभी बाकी है I इस सब मामलो में आई तेजी के कारण १४ नवम्बर   २०१२ में एक विशेष कानून बनया गया जो 18 साल से कम उम्र के बच्चो को छेड़छाड़ , योंन शोषण कुकर्म जेसे मामलों में सुरक्षा प्रदान करेगा इस एक्ट का नाम है पोक्सो एक्ट l

18 साल से कम उम्र के बच्चों से किसी भी तरह का सेक्सुअल बर्ताव इस प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेंस (पोक्सो) कानून के दायरे में आता है। इसके तहत लडक़े और लडक़ी,दोनों को ही प्रोटेक्ट किया गया है। इसके तहत दोषियों के लिए कठोर सजा का प्रावधान है। इसमें प्रावधान है कि मामले की सुनवाई के लिए विशेष अदालत गठित की जाएगी, जो एक वर्ष के भीतर मामले का निपटारा करेगी।इस तरह के मामलों की सुनवाई स्पेशल कोर्ट में होती है और बच्चों के साथ होने वाले अपराध के लिए उम्रकैद तक की सजा हो सकती है। इस एक्ट के तहत बच्चों को सेक्सुअल असॉल्ट, सेक्सुअल हैरेसमेंट और पोर्नोग्राफी जैसे अपराधों से प्रोटेक्ट किया गया है। 2012 में बने इस कानून के तहत अलग-अलग अपराध के लिए अलग-अलग सजा तय की गई ।
इसमें मामले की रिपोर्टिंग, सुबूतों की रिकॉर्डिंग, जांच एवं सुनवाई जैसी तमाम न्यायिक प्रक्रिया को बच्चों के अनुकूल बनाया गया है, जिसमें पीड़ित बच्चे के बयान की रिकॉर्डिंग सब इंस्पेक्टर रैंक से ऊपर की महिला अधिकारी द्वारा उसके घर या मनोवांछित जगह पर करने, तीस दिनों के भीतर सुबूत जुटाने और रात में बच्चों को थाने में नहीं रखने का प्रावधान भी किया गया है ।



इसमें बयान लेते वक्त पीड़ित को अनुवादक, विशेषज्ञ एवं व्याख्या करने वाले की सहायता देने एवं निःशक्त बच्चों को विशेष शिक्षक या किसी परिचित की मदद देने के साथ माता-पिता या विश्वस्त अभिभावक के सामने चिकित्सकीय जांच करने का प्रावधान है ।

यदि पीड़ित लड़की है, तो उसकी जांच महिला डॉक्टर ही करेगी। बच्चों को गवाही के लिए बार-बार नहीं बुलाने, सुनवाई के दौरान अवकाश देने एवं असुविधाजनक सवाल न पूछने एवं बंद कमरे में सुनवाई करने का भी इसमें प्रावधान है। इसके साथ ही मुफ्त क़ानूनी सलाह व वकील की मदद भी देना का प्रवधान इस कानून में किया गया है क़ानूनी तोर पर हर संभव मदद के बाद भी बहुत से योंन उत्पीडन के मामले सामने नहीं आ पाते जिससे दोषियों के होसले बढ़ जाते है और वो एक के बाद एक कई  बच्चो  को अपनी  गन्दी सौच का निशाना बनाते है इस वक़्त जरुरत है जागरूक होने की इस कानून की जानकारी अधिक से अधिक लोगो तक पहुचाए ताकि समाज को जल्द से जल सुरक्षित ब नया जा सके l

Shallu Duggal

LEAVE A REPLY